किसान का होशियार बेटा | Clever Son of Farmer Panchatantra Story

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Clever Son of Farmer Panchatantra Story
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किसान का होशियार बेटा | Clever son of farmer panchatantra story

Clever son of farmer panchatantra story: बहुत पहले की बात है शंकर नाम का एक किसान था। वह किसानी करके और अपने पेड़ों की लकड़ियाँ बेच कर अपना गुजारा करता था। एक बार वह लकड़ियों को बैल गाड़ी में डाल कर बेचने के लिए दूसरे गांव गया।

रास्ते में शंकर को उस गांव का एक सेठ मिल गया। सेठ ने शंकर से लकड़ी के लिए पूछा ‘गाड़ी का कितना है ‘ शंकर ने बताया सबका 5 रूपए है। सेठ ने कहा ठीक है मै यह खरीद रहा हूँ। इसको तुम मेरे घर पर छोड़ दो।

शंकर लकड़ी से भरी बैल गाड़ी लेकर सेठ के घर पहुंच गया। शंकर ने लकड़ियाँ सेठ को दी पैसे लिए और अपनी बैल गाड़ी को लेकर आने लगा तो सेठ बोला हमारी पूरी गाड़ी की बात हुई थी। अब यह बैल गाडी तुम नहीं ले जा सकते।

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शंकर ने कहा ऐसा थोड़ी होता है। सेठ ने कहा तुमने गाड़ी का 5 रूपए का वचन दिया है अब तुमको अपने वचन का पालन करना चाहिए। व्यापार में वचन बहुत मायने रखती है। शंकर के काफी समझाने के बाद भी सेठ नहीं माना।

जिससे उसको खाली हाथ ही लोटना पड़ा। घर पहुंचने पर उसके बेटों ने बेलगाड़ी के बारे में पूछा तो उसने सेठ की करतूत को उनको बता दिया। शंकर का सबसे छोटा बेटा होशियार था। उसने सेठ को सबक सिखाने की सोची।

वह अगले दिन उसी तरह बैल गाडी में लकड़िया डाल कर उसी गाँव की तरफ जाने लगा। रास्ते में उसको भी वही सेठ मिल गया। सेठ ने सोचा आज फिर एक बकरा आ रहा है।

सेठ ने फिर वही बात पूछी ‘गाड़ी का कितना है ‘ इस पर शंकर का बेटा बोला केवल ‘दो मुट्ठी’ सेठ सोचा यह तो कल वाले से भी मुर्ख है दो मुट्ठी में तो मै 2 आना दबाकर इसको दे दूंगा।

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उसने घर पर लकड़ियाँ छोड़ने को बोला। वह बैलगाड़ी को लेकर सेठ के घर पहुंच गया। घर पहुंचने के बाद उसने सारी लकड़ी सेठ को दे दी। सेठ अंदर से अपने दोनों हाथों की मुट्ठियों में 2 आना दबाकर ले आया।

उसने शंकर के बेटे को बोला लो दो मुट्ठी पैसे। शंकर के बेटे ने चाकू निकाला और बोला मैने दो मुट्ठी पैसे नहीं मांगे मुझे तुम्हारी हाथ की मुट्ठियाँ चाहिए और वह उनको काटने के लिए आगे बढ़ा।

इस पर सेठ ने मना किया तो शंकर का बेटा बोला तुमने वचन दिया है और व्यापार में वचन बहुत मायने रखती है। उसने सेठ को सारी बात बताई किस तरह उसने शंकर को ठगा था।

इस पर सेठ ने शंकर के बेटे से हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी और पहले की बैल गाड़ी और लकड़ियों का उचित मुलय दिया। इस तरह शंकर के बेटे ने अपनी होशियारी की वजह से अपने परिवार को ठगी से बचा लिया।

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