Learn about astrology | ज्योतिष विज्ञान के बारे में सीखें

Learn about astrology  ज्योतिष विज्ञान के बारे में सीखें
Learn about astrology ज्योतिष विज्ञान के बारे में सीखें

Learn about astrology | ज्योतिष विज्ञान के बारे में सीखें: एस्ट्रोलॉजी या ज्योतिष विज्ञान में बहुत से लोगों की रूचि होती है। आजकल के समय में लोग किसी न किसी मुसीबत से परेशान जरूर दिखाई देते है। कोई जॉब न मिलने के कारण परेशान है तो कोई शादी न होने के कारण। कोई किसी बीमारी से परेशान है तो कोई व्यापार न चलने के कारण। लोग इन सब समस्याओं से जल्द से जल्द छुटकारा पाना चाहते है जिसके कारण लोग एस्ट्रोलॉजर के पास जाते है।

किस कारण लोगों का विश्वास एस्ट्रोलॉजी से उठ रहा है?

लोगों को एस्ट्रोलॉजर से इसके कारण और सही समाधान की उम्मीद होती है। बहुत ही ऐसे कम एस्ट्रोलॉजर होते है जो एस्ट्रोलॉजी में पूरा ज्ञान रखते है और लोगों की समस्याओं का सही से समाधान कर पाते है।

आजकल जल्द टूटती शादी इसी का एक परिणाम है क्योंकि लोग ऐसे पंडितो और एस्ट्रोलॉजर के पास जाते है जिनको  कुंडली मिलान की पूरी जानकारी नहीं होती और वो सही से कुंडली मिलाय बिना अपनी दक्षिणा के चक्कर में कुंडली मिलने की हामी भर देते है। एस्ट्रोलॉजी एक बहुत ही विशाल शास्त्र है जिसमें पारंगत होने के लिए बहुत सालों का अभ्यास चाहिए होता है।

एस्ट्रोलॉजी रहस्य:

एस्ट्रोलॉजी एक गूढ़ विज्ञान का विषय है जो की बहुत प्राचीन समय से चला आ रहा है। इसमें आकाश में मौजूद ग्रहों के जीवन में होने वाले प्रभाव की गणना की जाती है। इसमें यह देखा जाता है की आपके जन्म के समय इन ग्रहों की क्या स्थिति थी और वर्तमान में इनकी क्या स्थिति है और कौनसे ग्रह आपके जीवन में क्या प्रभाव डाल रहे है और उनका नेचर कैसा है।

क्या एस्ट्रोलॉजी सच है?

बहुत से लोग एस्ट्रोलॉजी पर पूरी तरह से विश्वास करते है जिनने इसको अपने जीवन में काम करते हुए देखा है। लेकिन इसको न मानने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है।

ऐसे लोग यह तर्क देते है की आजकल विज्ञान के युग में यह सब काम नहीं करता और यह ग़लत है जिसमें केवल अंदाज़े पर भविष्यवाणी की जाती है जो सटीक नहीं होता । इनके इस मत पर एस्ट्रोलॉजर का जवाब यह होता है की यह विज्ञान के द्वारा सिद्ध हो चूका है की समुंद्र में आने वाला ज्वार भाटा चन्द्रमा के कारण आता है।

यदि चन्द्रमा के कारण इतने विशाल समुन्द्र के पानी पर प्रभाव पड़ता है तो हमारे शरीर पर इसका प्रभाव पड़ना तो लाजमी है क्योकि हमारा शरीर 70 % पानी से ही बना है।

एस्ट्रोलॉजी में ग्रह और राशियाँ:

एस्ट्रोलॉजी में मुख्य रूप से 7 ग्रह सूर्य , चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि इसके अलावा 2 छाया ग्रह राहु और केतु होते है। इसमें राशियाँ इस प्रकार होती है।

1 – मेष, 2 – वृष , 3 -मिथुन, 4 -कर्क , 5 -सिंह , 6 – कन्या , 7 -तुला, 8 -वृश्चिक , 9 -धनु, 10 -मकर, 11 -कुंभ , 12 -मीन। यह नंबर के हिसाब से राशियाँ फिक्स होती है इसका मतलब आपने कुंडली में जहाँ भी 6 नंबर देख लिया वहाँ पर कन्या राशि ही होगी। यह राशियाँ क्रम में होती है जैसे 1 के बाद 2 फिर 3। कुंडली में इन नमबरों की संख्या घड़ी के सेकंड की सुई के चलने से उल्टी दिशा में होती है। 

राशियों के स्वामी ग्रह:

मेष और वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल है। वृष और तुला राशि के स्वामी शुक्र है।  मिथुन और कन्या राशि के स्वामी बुध है। धनु और मीन राशि के स्वामी गुरु है। मकर और कुम्भ राशि के स्वामी शनि देव है। लेकिन सूर्य और चंद्र देव की 1 – 1 राशि है। सूर्य देव की राशि सिंह और चंद्र देव की राशि कर्क होती है।

कुंडली की संरचना:

पूरी कुंडली को 360 डिग्री का माना जाता है। जिसमे 12 राशियाँ और 9 ग्रह होते है। कुंडली को 12 हिस्सों में बांटा गया है। जिसकी शुरुवात लग्न से होती है। जो पहला खाना होता है वह लग्न ही कहलायेगा। चाहे उसमे कोई भी राशि क्यूँ न हो।  1 , 4, 7 और 10 खाने को केंद्र के घर कहा गया है।

एक राशि पुरे 30 डिग्री की होती है। एक राशि में कितने भी ग्रह हो सकते है यह उस समय आकाश में ग्रह की स्थिति पर निर्भर करता है। कुंडली में कुल 27 नक्षत्र होते है। एक राशि के अंदर लगभग 2 नक्षत्र पड़ते है।

ग्रहो की महादशा का समय:

1. सूर्य – 6 वर्ष

2. चंद्र  – 10 वर्ष

3. मंगल – 7 वर्ष

4. बुध – 17 वर्ष

5. बृस्पति – 16 वर्ष

6. शुक्र – 20 वर्ष

7. शनि – 19 वर्ष

8. राहु – 18 वर्ष

10. केतु – 7 वर्ष 

ग्रहों की उच्चता और नीचता:

सारे ग्रहों की एक उच्च और एक नीच राशि होती है। अपनी उच्च राशि में ग्रह बहुत अच्छे परिणाम देते है जीवन में या फिर जब भी उस ग्रह की महादशा और अन्तर्दशा चलती है लेकिन यदि वह नीच राशि में हो तो वो अपनी महादशा और अन्तर्दशा में ख़राब ही परिणाम ही देते है। 

ग्रहों की मित्रता और शत्रुता:

जब ग्रहों की मित्रता और शत्रुता का सवाल आता है तो इसको हम आसान शब्दो में समझाते है। ग्रह दो श्रेणी में आते है। एक श्रेणी में देव और दूसरे में दानव शामिल है।

देव ग्रहों में सूर्य, चंद्र, मंगल और बृस्पति शामिल है। दानव ग्रहों में राहु , केतु , शनि और शुक्र शामिल है। बुध बीच की केटेगरी में आता है। लेकिन यह दानव ग्रहों का ज्यादा मित्र है।

देव ग्रह आपस में मित्र होते है और साथ किसी भी राशि में बैठने पर सही परिणाम देते है। दानव ग्रह भी आपस में मित्रता रखते है। ये दोनों दानव और देव ग्रह आपस में शत्रु होते है और एक राशि में साथ बैठने पर अच्छा परिणाम नहीं देते।

क्रूर और विच्छेदात्मक ग्रह:

सूर्य, राहु , केतु , शनि क्रूर और विच्छेदात्मक ग्रहों में आते है। यह कुंडली के जिस भी घर में हो वहाँ क्रूरता और विच्छेद वाले परिणाम ही देते है इनकी दृष्टि भी विच्छेदात्मक होती है।

ग्रहों का बल:

ग्रहों का भी अपना बल होता है जिसके हिसाब से वह परिणाम देते है। यदि किसी ग्रह का बल ज़्यादा होगा तो वह अपने पुरे परिणाम देगा और यदि किसी ग्रह का बल कम है तो वह अपने पुरे परिणाम देने में कारगर नहीं होगा। लेकिन इससे इसका मतलब अच्छा या बुरा परिणाम से नहीं है।

यदि किसी अच्छे ग्रह का बल ज्यादा है तो वह अपने शुभ परिणाम पूरी ताकत से देगा लेकिन यह कम बल की स्थिति में है तो यह सही नहीं है जिससे हमें उसके सभी लाभ नहीं मिल पाएंगे। यदि कोई क्रूर ग्रह जो आपकी कुंडली के लिए योगकारक नहीं है यदि वह पुरे बल में है तो यह अच्छा नहीं है

जिससे आपको ज़्यादा ख़राब परिणाम मिलेंगे और यदि यही ग्रह कम बल में है तो यह अच्छा है जिससे आपको इसके कम बुरे परिणाम मिलेंगे। ग्रह का बल उसकी स्थिति पर निर्भर करता है जो की उसकी डिग्री होती है।

जिस तरह यह आप जान गए की एक राशि पूरी 30 डिग्री की होती है इस 30 डिग्री में कोई ग्रह 0 से लेकर 30 के बीच में स्थित होता है।

ग्रहों की अवस्था:

1. यदि कोई ग्रह 0 – 6 डिग्री के बीच होता है तो यह उसकी बाल अवस्था कहलाएगी जिसमें वह अपने परिणाम देने में बहुत कम काबिल होगा। यह भी कह सकते है ग्रह अभी बच्चा है।

2. जब कोई ग्रह 6 – 12 डिग्री की बीच होता है तो यह उसकी युवा अवस्था होती है जिसमे वह अपने बाल अवस्था से थोड़े ज़्यादा परिणाम देता है।

3. यदि कोई ग्रह 12 – 18 डिग्री के बीच में होता है तो यह व्यस्क अवस्था में होता है इस स्थिति में यह अपनी पूरी ताकत के साथ परिणाम देने में कारगर होता है।

4. जब कोई गृह 18 – 24 डिग्री के बीच में होता है तो यह प्रौढ़ अवस्था में होता है जिसमे यह व्यस्क से कम परिणाम देता है।

5. अंतिम अवस्था होती है 24 – 30 डिग्री की बीच की जिसमें यह बहुत कम परिणाम देता है यह स्थिति इसकी बाल अवस्था से मिलती है।

ग्रहों की उच्च और नीच राशि:

सूर्य अपने मित्र मंगल की राशि मेष में उच्च का होता है जिसमे यह बहुत ही शानदार परिणाम देता है। सूर्य की नीच राशि तुला राशि होती है जो की सूर्य के शत्रु शुक्र की राशि होती है। सूर्य तुला राशि में जाकर बहुत ख़राब परिणाम देता है।

चंद्र की उच्च राशि वृष होती है जो की शुक्र की राशि है और चंद्र की नीच राशि वृश्चिक होती है जो की मंगल की राशि है। हालांकि चंद्र और मंगल आपस में मित्र है लेकिन फिर भी चंद्र मंगल की राशि में नीच परिणाम देता है।

Learn about astrology | ज्योतिष विज्ञान के बारे में सीखें:

मंगल अपने शत्रु शनि की राशि मकर में उच्च का होता है ऐसा इसलिए क्योंकि आक्रामक ग्रह है जो की अपने शत्रु की राशि में जाकर अपने पूरी ताकत और आक्रामकता दिखा सकता है। और वह अपने मित्र चंद्र की राशि कर्क में नीच का होता है।

बुध अपनी राशि कन्या में उच्च का परिणाम देता है जबकि अपने शत्रु गुरु की राशि मीन में नीच का होता है और ख़राब परिणाम देता है।

गुरु चंद्र की राशि कर्क में उच्च का होता है और एक बहुत ही प्रसिद्ध गजकेसरी योग का निर्माण भी करता है। जबकि यह शनि की राशि मकर में नीच का होता है।

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शुक्र अपने शत्रु गुरु की राशि मीन में उच्च का होता है क्योंकि यह बारहवीं राशि है इसके हिसाब से यह शैया सुख का स्थान हुआ जो शुक्र को पसंद है। लेकिन यह अपने मित्र बुध की राशि कन्या में नीच का होता है।

शनि अपने परम मित्र शुक्र की राशि तुला में उच्च का होता है जबकि अपने शत्रु मंगल की राशि मेष में नीच का होता है।

राहु अपने मित्र बुध की राशि मिथुन में उच्च का और अपने शत्रु गुरु की राशि धनु में नीच का होता है। इसके विपरीत केतु गुरु की राशि धनु में उच्च का और बुध की राशि मिथुन में नीच का होता है।